भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही गोलीबारी पर कल विराम लग गया, मन में थोड़ी मायूसी सी हुई क्योंकि दिल चाहता था कि पाकिस्तान को एक बार सही तरीके से सबक सिखा दिया जाए। लेकिन जब थोड़ी देर गहराई से सोचा, तो प्रतीत हुआ कि यह युद्धविराम एक प्रकार से ठीक ही हुआ, क्योंकि इस समय युद्ध भारत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता था।
भारत एक बहुत ही तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी शक्ति बन चुका है। इसके उलट पाकिस्तान आज कर्ज में डूबा हुआ, आतंकवाद का पोषक, और एक ऐसे देश की हालत में पहुँच चुका है जो किसी भिखारी से भी बदतर हाल में अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
कोई भी सभ्य और विकसित अर्थव्यवस्था कभी युद्ध नहीं चाहती है। भारत भी शांति चाहता है, लेकिन बार-बार पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद और गोलीबारी की घटनाएं भारत को विवश करती हैं। मन तो चाहता था कि एक बार इस आतंक के अड्डे पाकिस्तान का पूर्ण विनाश कर दिया जाए, टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं, लेकिन यह करना भारत को भी भारी नुकसान में डाल सकता था। और भारत का नुकसान किसी भी शर्त पर हमें मंज़ूर नहीं।
चीन और अमेरिका जैसे देश चाहते हैं कि भारत युद्ध में उलझा रहे ताकि उसका विकास रुक जाए, लेकिन भारत की खुशनसीबी है कि यहाँ की सरकारें ज़िम्मेदार और दूरदर्शी रही हैं, जिन्होंने हमेशा युद्ध से परहेज़ किया है। ये नीति भारत के विकास के लिए बहुत लाभदायक रही है।
इसके विपरीत पाकिस्तान ने हमेशा भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा दिया, युद्ध छेड़े, और आज परिणाम यह है कि पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र बनने की कगार पर है। पाकिस्तान की करतूतों के कारण भारत को अब तक चार युद्ध जबरन लड़ने पड़े – 1948, 1965, 1971, और 1999 का कारगिल युद्ध। हर बार भारत ने पाकिस्तान को हराया, लेकिन हर बार हम कुछ न कुछ खोते भी गए।
1965 में भारत लाहौर तक पहुँच गया, लेकिन हमने फिर से शांति की पहल करते हुए ताशकंद समझौता किया और जीती हुई ज़मीन लौटा दी। पंडित नेहरू द्वारा की गई सिंधु जल संधि भी एक आत्मघाती निर्णय साबित हुई। 1971 में इंदिरा गांधी जी के नेतृत्व में पाकिस्तान को एक और हार मिली और बांग्लादेश का जन्म हुआ, लेकिन 93000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को हमने कई महीनों तक खिलाया–पिलाया और अंत में बिना किसी ठोस समझौते के लौटा दिया। जिस बांग्लादेश को अलग करने के लिए भारत ने कई नुकसान उठाए वही बांग्लादेश आज भारत के लिए सरदर्द बना हुआ है, हर युद्ध के बाद एक समझौता भारत पर थोपा गया, ताशकंद हो या शिमला, सबमें भारत को ही नुकसान हुआ, इंदिरा गांधी के द्वारा किया गया शिमला समझौता भी लगभग एकतरफा और अदूरदर्शी फैसला था।
अब कल्पना कीजिए, यदि बलूचिस्तान भी अलग हुआ और भविष्य में एक और बांग्लादेश बन गया, तो भारत कितने मोर्चों पर आतंकवाद झेलेगा? इसलिए भारत को बिना सोचे–समझे युद्ध में नहीं कूदना चाहिए। हाँ, अगर युद्ध केवल पीओके (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर) को वापस लेने के लिए हो, तो वह बिल्कुल उचित और न्यायोचित है।
क्योंकि पीओके कोई विदेशी ज़मीन नहीं, बल्कि भारत का ही अभिन्न हिस्सा है। उसे आज़ाद कराने के लिए युद्ध हो तो वह युद्ध नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई जमीन की वापसी होगी।
इस बार की झड़पों से भारत को जो कूटनीतिक और रणनीतिक लाभ हुआ, वो महत्वपूर्ण हैं:
- पाकिस्तान की कई चौकियाँ तबाह की गईं, LOC पर भारतीय सेना की पकड़ और मज़बूत हुई।
- पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर बेनकाब किया गया, FATF में ब्लैकलिस्ट होने के कगार पर पहुँचा।
- भारत ने सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार की प्रक्रिया तेज की।
- भारत की नई नीति स्पष्ट कर दी गई – "आतंकवाद अब युद्ध के बराबर माने जाएंगे।"
जय हिंद, वंदे मातरम।
"कृष्णा कांत मिश्रा"
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