महत्वाकांक्ष - मानवता के विनाश की शुरुआत।


महत्वाकांक्षा मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाली वह अग्नि है जो कभी शांत नहीं होती। यह उस अग्नि की तरह है जिसे जितना अधिक घी दिया जाए, वह उतनी ही प्रज्वलित होती जाती है। जैसे रक्तबीज के शरीर से गिरने वाली प्रत्येक बूँद से नया राक्षस उत्पन्न होता था, वैसे ही मनुष्य की प्रत्येक इच्छा, प्रत्येक चाह और प्रत्येक आकांक्षा से नई-नई महत्वाकांक्षाएँ जन्म लेती हैं। मनुष्य सोचता है कि केवल एक लक्ष्य प्राप्त कर लेने से वह संतुष्ट हो जाएगा, लेकिन जैसे ही वह एक लक्ष्य प्राप्त करता है, दस और उसकी प्रतीक्षा में खड़े हो जाते हैं। यही महत्वाकांक्षा का स्वभाव है – वह कभी पूर्णता का अनुभव नहीं होने देती।

प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों ने चेताया है कि इच्छाओं की वृद्धि ही दुःख का मूल कारण है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं –

“ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥”

विषयों का चिंतन करने से मनुष्य को उनमें आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध। जब क्रोध उत्पन्न होता है तो विवेक नष्ट हो जाता है, और जब विवेक नष्ट हो जाता है तब मनुष्य अपने ही पतन का कारण बनता है। यही महत्वाकांक्षा का चक्र है — पहले इच्छा, फिर आसक्ति, फिर क्रोध और फिर विनाश।

महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा धोखा यह है कि वह स्वयं को ही सत्य मानती है। जो व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है, वह अपने अलावा किसी अन्य सत्य को स्वीकार नहीं करता। उसके लिए नीति, धर्म, करुणा, न्याय – सब अर्थहीन हो जाते हैं। उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह जाता है – अपने स्वप्न को किसी भी मूल्य पर प्राप्त करना। यही कारण है कि इतिहास के हर युग में महान विनाश के मूल में किसी न किसी की महत्वाकांक्षा रही है।

महाभारत इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा थी कि हस्तिनापुर का सिंहासन उसके पुत्रों को ही मिले। उसने कभी धर्म और नीति की परवाह नहीं की। भीष्म की सलाह, विदुर की बुद्धि, संजय की चेतावनी – सबको उसने अनसुना कर दिया। उसके मन में केवल एक ही इच्छा थी – उसके पुत्रों का राज्य। परिणामस्वरूप वह इच्छा रक्तबीज की तरह बढ़ती गई, और अंततः महाभारत जैसा भयानक युद्ध हुआ जिसमें उसके सभी पुत्र मारे गए और उसका वंश समाप्त हो गया। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं –

“कामा एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥”

यह काम (महत्वाकांक्षा) और क्रोध रजोगुण से उत्पन्न होते हैं, यह सबकुछ भस्म कर देने वाले हैं। यह महापापी हैं और यही तुम्हारा शत्रु है।

महत्वाकांक्षा केवल राजाओं या योद्धाओं में ही नहीं होती, यह हर व्यक्ति के भीतर होती है। जब यह धर्म की मर्यादा में रहती है तो विकास का कारण बनती है, पर जब मर्यादा से बाहर निकल जाती है, तब विनाश का कारण बनती है। रावण की महत्वाकांक्षा ने उसे संपूर्ण त्रिलोक का स्वामी बनने की इच्छा दी। उसने अद्भुत तपस्या कर शक्ति और वरदान प्राप्त किए, परंतु यही महत्वाकांक्षा उसे सीता हरण करने पर विवश कर गई। परिणामस्वरूप श्रीराम के हाथों उसका विनाश हुआ और उसकी पूरी लंका भस्म हो गई।

इतिहास में भी यही दृश्य बार-बार दोहराया गया। सिकंदर की महत्वाकांक्षा थी कि वह पूरी पृथ्वी को जीत ले। उसने एशिया, अफ्रीका और यूरोप का बड़ा भाग जीत लिया, परंतु अंत में एक बीमारी ने उसे मात्र 32 वर्ष की आयु में मार दिया। वह उस मिट्टी में मिल गया जिसे जीतने निकला था। सम्राट अशोक की महत्वाकांक्षा ने कलिंग का युद्ध कराया, जिसमें लाखों लोग मारे गए। विजय के बाद भी उसे शांति नहीं मिली, और अंततः उसने बौद्ध धर्म अपनाकर हिंसा का मार्ग त्याग दिया। यह उदाहरण बताते हैं कि महत्वाकांक्षा कभी संतोष नहीं देती – वह प्राप्ति के बाद भी नयी इच्छा को जन्म देती है और मनुष्य को और अधिक पाने की लालसा में डुबो देती है।

महत्वाकांक्षा मनुष्य को अपने स्वभाव से विमुख कर देती है। वह अपने भीतर की आत्मा को भूलकर बाहरी वस्तुओं में तृप्ति खोजने लगता है। अवधूत गीता कहती है –

“नाहं देहो न मे देहो देहो भोक्ता न चाप्यहम्।
अहं चैतन्यरूपोऽस्मि निराकारोऽस्म्यहं शिवः॥”

न मैं शरीर हूँ, न यह शरीर मेरा है, न मैं इसका भोगी हूँ। मैं शुद्ध चैतन्य हूँ, निराकार हूँ, शिवस्वरूप हूँ।

जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब महत्वाकांक्षा का कोई अर्थ नहीं रह जाता। लेकिन जब वह स्वयं को केवल शरीर और इंद्रिय-सुख के आधार पर पहचानता है, तब महत्वाकांक्षा उसकी स्वामिनी बन जाती है। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया है —

**“न जातु कामः

कृष्णा कांत मिश्रा

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