भारत
और चीन दोनों ही
प्राचीन सभ्यताएँ हैं। इन दोनों
का रिश्ता हज़ारों साल पुराना है।
भारत से बौद्ध धर्म
चीन पहुँचा और वहाँ की
संस्कृति को गहराई से
प्रभावित किया। फाह्यान और ह्वेनसांग जैसे
चीनी यात्री भारत आए और
यहाँ की सभ्यता, संस्कृति
और समाज का गहरा
अध्ययन करके अपने देश
ले गए। इस तरह
दोनों देशों ने एक-दूसरे
की जीवनशैली और सोच को
समझा और आपसी संबंध
मज़बूत हुए।
आधुनिक
दौर में भारत और
चीन लगभग एक ही
समय में स्वतंत्र हुए।
भारत ने 15 अगस्त 1947 को आज़ादी पाई
और पंडित नेहरू के नेतृत्व में
लोकतांत्रिक गणराज्य बना। चीन ने
भी 1 अक्टूबर 1949 को माओ त्से
तुंग के नेतृत्व में
कम्युनिस्ट जनवादी गणराज्य की घोषणा की।
उस दौर में दोनों
देशों के बीच दोस्ती
और भाईचारे का माहौल बना।
नेहरू ने "हिंदी-चीनी भाई-भाई"
का नारा दिया और
दोनों एशियाई ताक़तें एक-दूसरे के
करीब दिखने लगीं।
लेकिन
यह दोस्ती लंबे समय तक
नहीं चल पाई। सीमाओं
को लेकर विवाद बढ़ने
लगे। अक्साई चिन और अरुणाचल
प्रदेश पर दोनों देशों
का दावा टकराया और
1962 का युद्ध हुआ। इस युद्ध
ने दोनों के रिश्तों में
गहरी दरार डाल दी
और उसके बाद से
ही अविश्वास का माहौल बना
रहा। हालाँकि व्यापार और कुछ अंतरराष्ट्रीय
मंचों पर दोनों का
सहयोग बना रहा, लेकिन
सीमा विवाद और चीन की
पाकिस्तान-निकट नीति ने
भारत के लिए हमेशा
चिंता की स्थिति पैदा
की।
अगर
आज की परिस्थिति में
देखा जाए तो भारत
और चीन को दुश्मनी
छोड़कर साथ आना ही
पड़ेगा। वजह साफ़ है
कि अमेरिका जैसी महाशक्ति इन
दोनों के बीच लगातार
रोड़े अटका रही है।
हाल ही में डोनाल्ड
ट्रंप ने भारत पर
करीब 50% का एकतरफ़ा टैरिफ
लगा दिया, जिससे भारत को भारी
नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पहले भारत का अमेरिका
को निर्यात लगभग 87 अरब डॉलर का
था, लेकिन टैरिफ के कारण यह
व्यापार घटकर 50 अरब डॉलर से
भी नीचे जा सकता
है। मतलब सीधा-सीधा
35 से 40% का नुकसान।
इस टैरिफ का सबसे बड़ा
असर श्रमिक-आधारित उद्योगों पर पड़ रहा
है। झींगा निर्यात में 15–18% की गिरावट का
अंदेशा है, जिससे लगभग
5 अरब डॉलर का व्यापार
डूब सकता है। ओडिशा
जैसे राज्यों में झींगा की
हैचरियाँ बंद हो रही
हैं और हज़ारों लोगों
की रोज़ी-रोटी छिन रही
है। इसी तरह कपड़ा,
गहना, फर्नीचर, चमड़ा और रसायन जैसे
सेक्टर भी बुरी तरह
प्रभावित हो रहे हैं,
जहाँ 70% तक निर्यात घटने
की संभावना है। इसका सीधा
असर लाखों नौकरियों पर पड़ेगा।
केवल
यही नहीं, इन टैरिफ़ों का
असर भारत की GDP पर
भी दिखेगा। अनुमान है कि भारत
की वृद्धि दर पर 0.6 से
0.8 प्रतिशत तक की चोट
लगेगी। यह तब है
जब भारत की अर्थव्यवस्था
पहले से तेज़ी से
आगे बढ़ रही थी।
साफ़ है कि अमेरिका
अपनी ताक़त और राजनीतिक दबाव
का इस्तेमाल कर भारत पर
जबरदस्ती की नीतियाँ थोपना
चाहता है। लेकिन आज
के वैश्विक दौर में कोई
भी देश किसी पर
जबरदस्ती अपनी शर्तें नहीं
थोप सकता।
यही
वजह है कि भारत
और चीन को आपसी
मतभेदों को पीछे छोड़कर
सहयोग की राह अपनानी
चाहिए। अगर ये दोनों
एशियाई ताक़तें साथ खड़ी होती
हैं तो अमेरिका जैसी
ताक़तों की दबावकारी नीतियों
का संतुलन आसानी से किया जा
सकता है। साथ ही
यह कदम न केवल
भारत और चीन बल्कि
पूरे एशिया और विश्व के
लिए नए अवसर खोलेगा।
लेकिन
हम चीन पर आँख
मूँदकर भरोसा भी नहीं कर
सकते, क्योंकि उसकी भी आदत
रही है पीछे से
वार करने की। इतिहास
गवाह है कि "भाई-भाई" के नारे के
बाद भी उसने पीठ
में छुरा घोंपा था।
इसलिए भारत को सतर्क
रहते हुए, अपने हितों
को संभालते हुए ही चीन
को साथ लेकर आगे
बढ़ना होगा।
दरअसल
भारत और चीन में
दुनिया को बदलने की
ताक़त है। दोनों मिलकर
कुछ नया करने का
माद्दा रखते हैं। यह
बात कोई छोटी नहीं
है कि भारत और
चीन में मिलाकर दुनिया
की लगभग 35% जनसंख्या रहती है—यानि
पूरी मानव जाति का
एक-तिहाई से भी अधिक
हिस्सा। इतनी बड़ी आबादी
अपने आप में वैश्विक
बाज़ार का केंद्र है।
कोई भी देश अगर
अपने माल और सामान
बेचना चाहता है तो उसे
भारत और चीन जैसे
बड़े बाज़ारों में आना ही
पड़ेगा।
इतना
सब जानते हुए भी अमेरिका
का बार-बार भारत
और चीन से उलझना
समझ से परे है।
शायद उसकी चिंता यही
है कि अगर ये
दोनों देश आपस में
एक हो गए तो
उसकी वैश्विक ताक़त और दबदबा कमज़ोर
हो जाएगा। इसलिए अमेरिका तरह-तरह से
चालें चलता है, कभी
टैरिफ लगाता है, कभी पाबंदियाँ,
कभी सैन्य और सामरिक गठबंधन
के ज़रिए भारत और चीन
को अलग रखने की
कोशिश करता है।
अभी
हाल ही में हमारे
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी
जी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में
चीन गए थे। वहाँ
से कई सकारात्मक खबरें
सामने आई हैं। बातचीत
में डोकलाम जैसे संवेदनशील मुद्दों
पर नरमी दिखी, कैलाश
मानसरोवर यात्रा को लेकर सहूलियतें
देने की बात हुई
और व्यापार के परिदृश्य में
भी नई संभावनाओं के
संकेत मिले। इन चर्चाओं से
यह उम्मीद बंधी है कि
भारत और चीन अगर
सही दिशा में कदम
बढ़ाएँ तो कई पुराने
विवाद धीरे-धीरे सुलझ
सकते हैं।
आज की SCO की बैठक में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन
के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के
बीच लंबी और खुली
बातचीत हुई। यह मुलाक़ात
इसलिए भी अहम मानी
जा रही है क्योंकि
कई सालों से दोनों देशों
के बीच सीमाई तनाव,
व्यापारिक मतभेद और राजनीतिक अविश्वास
बना हुआ था। लेकिन
इस बार की चर्चा
से माहौल पहले से कहीं
ज़्यादा सकारात्मक दिखा।
सबसे
बड़ी बात यह रही
कि दोनों नेताओं ने सीमा पर
शांति और स्थिरता बनाए
रखने पर सहमति जताई।
हाल ही में जो
नया सीमा प्रबंधन समझौता
हुआ है, उस पर
अमल करने की बात
को भी आगे बढ़ाया
गया। इसका मतलब है
कि भविष्य में डोकलाम या
गलवान जैसी घटनाएँ रोकने
की कोशिशें तेज़ होंगी।
इसके
अलावा धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि
से बेहद महत्वपूर्ण कैलाश
मानसरोवर यात्रा को लेकर भी
सहूलियतें देने का निर्णय
लिया गया। भारतीय श्रद्धालुओं
के लिए अब यात्रा
पहले से आसान और
सुरक्षित हो सकेगी। इसी
कड़ी में दोनों देशों
ने सीधी उड़ानों को
फिर से शुरू करने
की घोषणा की, जिससे व्यापार,
पर्यटन और आपसी संपर्क
को और गति मिलेगी।
व्यापार
के क्षेत्र में भी नई
संभावनाएँ खुल रही हैं।
भारत और चीन दोनों
मानते हैं कि अगर
वे मिलकर काम करें तो
न सिर्फ़ एक-दूसरे को
लाभ होगा बल्कि पूरा
एशिया और विश्व अर्थव्यवस्था
मज़बूत होगी। अमेरिका के टैरिफ़ और
दबाव की नीतियों के
बीच यह साझेदारी दोनों
देशों के लिए नया
विकल्प साबित हो सकती है।
बैठक
में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने
एक बड़ा प्रतीकात्मक संदेश
दिया—उन्होंने कहा कि “ड्रैगन
और हाथी को साथ चलना चाहिए।” यानी चीन और
भारत अगर साथ आ
जाएँ तो दुनिया की
सबसे बड़ी आबादी और
सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएँ
मिलकर इतिहास का नया अध्याय
लिख सकती हैं।
प्रधानमंत्री
मोदी ने भी इसी
भावना का स्वागत करते
हुए शी जिनपिंग को
भारत में होने वाले
BRICS 2026 शिखर सम्मेलन में आने का
निमंत्रण दिया। शी ने इसे
सहर्ष स्वीकार किया और भारत
की अध्यक्षता को समर्थन देने
का भरोसा दिया।
अगर
भारत और चीन साथ
मिलकर चलते हैं तो
निश्चित ही अमेरिका जैसे
देशों को बड़ा झटका
लगेगा। भारत और चीन
अकेले ही दुनिया की
एक-तिहाई से ज़्यादा आबादी
और विशाल बाज़ार पर क़ब्ज़ा रखते
हैं, और अगर ये
दोनों रूस और ब्राज़ील
जैसे देशों के साथ मिलकर
कोई मज़बूत संगठन खड़ा कर दें,
तो पश्चिमी देशों की अब तक
की एकछत्र सत्ता को गंभीर चुनौती
मिल जाएगी। इससे अमेरिकी वर्चस्व
(monopoly) कमज़ोर होगा और वैश्विक
शक्ति संतुलन में नया बदलाव
आएगा।
किसी
भी मज़बूत देश का अन्यायपूर्ण
रवैया केवल उसी देश
के लिए नहीं बल्कि
पूरे विश्व के लिए ख़तरा
पैदा करता है। यही
आज अमेरिका के साथ हो
रहा है। अगर मौजूदा
हालात में भारत-अमेरिका
संबंधों को देखा जाए
तो यह पहले से
कहीं अधिक ख़राब स्थिति
में पहुँच चुके हैं। ओबामा
के समय जहाँ सहयोग
और विश्वास का रिश्ता दिखता
था, वहीं डोनाल्ड ट्रम्प
की दूसरी पारी ने उस
भरोसे को पूरी तरह
तहस-नहस कर दिया।
यह स्थिति भारत के लिए
जितनी चुनौती है, उससे कहीं
ज़्यादा खतरनाक अमेरिका के लिए साबित
होगी। भारत एक उभरता
हुआ महाशक्ति और विश्व का
सबसे बड़ा बाज़ार है।
अगर अमेरिका इस बाज़ार से
टकराव की राह चुनता
है, तो इसका घाटा
उसे आने वाले दशकों
तक भरना मुश्किल होगा।
मेरी दृष्टि से देखा जाए तो आने वाला कल भारत और चीन के लिए स्वर्णजड़ित है। पश्चिमी देशों और विशेषकर अमेरिका का दौर अब ढलान पर है। इतिहास गवाह है कि जब कोई भी शक्ति अपने चरम पर पहुँचती है, तो उसके पतन की शुरुआत भी वहीं से होती है। यही हाल आज अमेरिका और पश्चिमी दुनिया का है।
इसलिए ज़रूरी है कि भारत और चीन अपने सारे मनमुटाव और अविश्वास को पीछे छोड़कर एक साथ कदम बढ़ाएँ। अगर ये दोनों एशियाई महाशक्तियाँ एकजुट होती हैं, तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कोई तीसरा देश आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करेगा।
यह केवल दोनों देशों के लिए नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए नए युग की शुरुआत होगी।
#जय_हिंद, #जय_भारत।
— कृष्णकांत मिश्र
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