कभी सोचा है अगर ज़िन्दगी में किसी भी गतिविधि या किसी काम को करने का साहस न हो तो अंजाम क्या होगा ? ज्यादा से ज्यादा हम एक अच्छा अवसर गवा देंगे या फिर ज़िन्दगी भर खुद के अंदर आत्मविश्वास नहीं ला पाएंगे
और आधी ज़िन्दगी ये सोचने में गवा देंगे कि काश तब थोड़ा साहस दिखाया होता तो आज में
वहां होती या होता , ये सारी बातें निर्भर करती है आत्म्विश्वास पे , साहस पे, जोकि हम किसी न किसी डर की वजह से नहीं कर पाते
| भले ही अब समय के साथ साथ जमाना आगे बढ़ गया है ,पर कही न कही हमारी हिचकिचाने या
घबराने की आदत की वजह से हम पीछे छूट गए| ये
बात तो सुनी ही है कि वक्त के साथ साथ सब कुछ बदल जाता है और सब बदल जाते है इस आधुनिक
ज़माने में हर कोई आगे बढ़ जाता है,पर बढ़ता वही है जिसने सही वक़्त पे साहस दिखाया और
सही फैसला चुना,क्योकि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता हमें खुद वक्त के साथ साथ ढलना
पड़ता है| पर कुछ लोग होते है जो सही समय पर फैसला नहीं ले पाते ,अपने डर की वजह से
या फिर अपने घबराहट की वजह से और बस लोगो को आगे बढ़ते देखते रहते है, और खुद के फैसले
पर पछतावा करते है , एक शर्मिन्दगी महूस
करते है|
मैं भी उनमें से एक हूँ, मुझमें भी इतना
साहस नहीं है ,की मै खुद को साबित कर सकूं|मेरे
अंदर भी आत्मविश्वास नहीं है,कोई बड़ा काम करने से पहले खुद पर शक करती रहती हूँ,खुदी
से पूछती हूँ जाऊं की न जाऊं ,बोलू की ना बोलू और लोग आगे बढ़ जाते है और मैं वही रह जाती हूँ ये सोचते हुवे कि क्या मुझसे ये होगा? वो
कहते है न कि अब पछताके क्या फायदा जब चिड़िया चुक गयी खेत, मेरे लिए कोई फ़ैसला लेना और किसी काम को अंजाम देना पहाड़
चढ़ने से कम नहीं है| मैं बहुत कोशिश करती
हूँ की अपने अंदर एक आत्मविश्वास लाऊँ ,सहस करू पर अंततः मैं सारी हिमत छोड़ देती हूँ और हार मान जाती हूँ, खुदी मैं
ढूंडती रहती हूँ की क्या मेरे अंदर कभी वो साहस ,वो हिमत आयेगी कि मैं अपना काम बिना
हिचकिचाये कर पाऊं| बड़े बुजुर्ग कहे गए है जो व्यक्ति कभी साहस नहीं कर पता,वो व्यक्ति अपनी पूरी ज़िन्दगी
मे कई चीज़ो से चूक जाता है और साहस दिखाना सिर्फ बड़े कामों के लिए नहीं होता बल्कि
अपनी रोज मर्रा की ज़िन्दगी मे भी कुछ फैसलों को लेने के लिए होता है| ऐसा नहीं है की
मैं कोशिश नहीं करना चाहती ,बल्कि मैं यही सोच करके पीछे छूट जाती हूँ की अगर ऐसा नहीं हुवा तोह क्या होगा ,लोग मुझपे हँसेंगे
बहुत सी बातें बनाएंगे | वैसे मै खुद को भी दिलासा देती हूँ,की मै ये कर सकती हूँ पर
जैसे ही वो समय आता है खुद को साबित करने का एक सही फैसला लेने का मै घबरा जाती हूँ,
लोगों की उम्मीदें तो बहुत रहती है, पर कही ना कही खुद पर आत्मविश्वास न होने के कारण
मैं उनकी उम्मीदों पे खरा नहीं उतर पाती| ऐसे
बहुत से किस्से है जहाँ साहस न दिखाने की वजह से मैं बाद में केवल पछताती हूँ|
ऐसा ही कुछ हुआ था एक बार जब
मैं स्कूल में पढ़ती थी दसवीं कक्षा में उस वक्त मैं पंद्रह साल की थी ,तो उस वक्त एक
प्रोत्साहन पुरुस्कार का समेलन हुआ था और मेरे टीचर ने मुझे चुना था उस सबमेलन में
भाग लेने के लिए और वो विज्ञानं से जुड़ा सबमेलन था उसमे अपनी सोच, अपने विचार से किसी
वैज्ञानिक चीज़ो को जोड़ कर एक प्रोजेक्ट बनाना था | मेरे
विज्ञानं के टीचर ने अपना विचार दिया और मेरा नाम लिख दिया वो आईडिया उस सबमेलन में
चुन लिया गया पर मुझे पता ही नहीं था, अगले
दिन हर कोई मुझे मुबारकबाद दे रहा और मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी मेरे टीचर ने मुझे
सारी बात बताई ,पर मुझे समझ नहीं आ रहा था की मै मै खुश हुए या नहीं ,ये मेरे लिए बहुत
बड़ा अवसर था पर कही न कही अंदर से मुझे डर लग रहा था की मै ये कर पाऊँगी या नहीं |
मेरे घर मे जब ये बात मैंने बतायी तो सब इतने खुश हुवे सब को लगा मेरी तस्वीर अखबार
में छपेगी ,जब जब ये सबमेलन के बारे में मुझसे कोई पूछता मेरे अंदर हिमत ही नहीं आती
थी ये कहने कि,कि हां मैं ये करुँगी बिना कुछ कहे चली जाती थी| जब सबमेलन में हिस्सा
लेने का दिन आया तो मैं और घबरा गयी और मैंने प्रोजेक्ट बनाने से मना कर दिया , सबने
मुझे बहुत समझाया पर मैं नहीं कर पाई, तो फिर सर ने फैसला लिया कि सिर्फ एक अटेंडेन्स
के लिए यानि एक हाजरी के लिए वह शामिल हो जाऊं और
वापिस आ जाऊं क्योकि प्रोजेक्ट तो मैंने
बनाया नहीं था ,जब उस सबमेलन मे शामिल हुए तो मेरे आगे पीछे इतने बच्चे थे जिन्होंने
अपना प्रोजेक्ट बनाया था ,किसे ने बोतल से किसी ने प्लास्टिक से ,सब ने कुछ तो बनाया
था बस मैंने कुछ महेनत नहीं की थी, जिन्होंने अपने आईडिया से बनाया था वो राज्या स्तर
के लिए चुन लिए गए थे और मै अपने में ही पछतावा
कर रही थी अगर थोड़ी हिम्मत ,थोड़ा साहस दिखाया होता तो मै भी राज्या स्तर के लिए चुन
ली गयी होती मैं भी कुछ सीखती एक नया अनुभव लेती,वो पहली बार था जब किसी की उम्मीदों
पर मैं खरी नहीं उतरी,यहाँ तक की खुद से ही नाराज़ थी| दूसरे बच्चे हंसी खशी घर जा रहे थे और मैं एक निराशा लेकर
उस वक्त मेरी परीक्षा भी चल रही थी ,पर एक अफ़सोस की वजह से मैं सारा दिन उसी बात को
सोचती थी की मेरे पेपर भी अच्छे नहीं गए मेरे सर ने जब ये बात पे ध्यान दिया तोह उन्होंने
मुझे कहा की उन चीज़ों पर अफ़सोस करने से कोई फायदा नहीं जो हो चुकी है,ज़िन्दगी में आगे
भी ऐसे और अफसर मिलेंगे उन्हें अपने डर की वजह से गवना मत| पर आज भी मेरी अंदर आत्मविश्वास
ना होने के कारण मै किसी चीज़ में शामिल नहीं होती, कही
पे कुछ बोलना चहु तोह बोल नहीं पाती ,जब कि मैं सही भी होती हूँ पर फिर भी अपने डर
की वजह से साहस नहीं कर पाती हूँ| ऐसा नहीं है कि हमेशा पीछे रहती हूँ कभी कभी साहस
दिखाती हूँ और बोल देती हूँ भले ही थोड़ा गलत बोल देती हूँ पर बोल देती हूँ,
और फिर दिल को एक सुकून सा मिलता है ,अभी भी
कोशिश करती हूँ की एक साहस दिखा सकूँ क्योकि शेक्सपियर ने कहा था, डरपोक अपनी मृत्यु से पहले कई बार मरते है,बहादुर मौत का
स्वाद और कभी नहीं बस एक बार चखते है आज भी हमेशा कोशिश करती हूँ की एक न एक दिन तो
कभी वो साहस ,वो हिमत आयेगी जिससे मै खुद को साबित कर पाऊँगी, क्योंकि एक कहावत है,"मन के हारे हार है,मन के जीते जीत"|
लेखिका :- "कल्पना" की कलम से

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