हमारा देश भारत आज हीं नहीं वरण कलांतर से राजनीतिज्ञों की भुमि रही है। ये वही भूमि है जहाँ चाणक्य जैसे महान राजनीतिज्ञ का पादुर्भाव हुआ , जिन्होंने चन्द्रगुप्त जैसे महान शासक कि उत्पत्ति सिर्फ अपनी बौद्धिक क्ष मता से की और आज भी भारत में बड़े बड़े राजनीतिज्ञो कि उत्पत्ति हो रही है और जब तक मानव प्रजाति इस वसुंधरा पर विध्यमान रहेगी तबतक भारत राजनीतिज्ञों की उत्पत्ति में अग्रणि भूमिका अदा करती रहेगी। लेकिन जैसे जैसे विक्रमी संवत आगे कि ओर अग्रेसित होना प्रारम्भ हुआ वैसे वैसे ही कुछ भारतीय राजनीतिज्ञों में फूट की भावना का उदय होना प्रारम्भ हो गया और इसी फूट की भावना के कारण ,भारत वर्षों तक गुलामी की जकड़न में कराहती रही। जब भारत गुलामी कि जंजीर में कराहती कराहती थक गई तो पुनः इस भूमि पर चरित्रवान और मातृभूमि पर प्राण न्योछावर करने वाले महान राजनीतिज्ञों का पादुर्भाव प्रारम्भ हो गया और भारत भूमि को अपनी निति और बल से स्वाधीन कराया।लेकिन स्वाधीनता आंदोलन के समय ही कुछ राजनेताओ के निज स्वार्थ के कारण इस पवित्र भूमि को खंडित होना पड़ा और उस खंडित का दंश आज भी हमें झेलना पड रहा है। ये तो रही आज़ादी के पहले कि राजनीती जिसमें कि राजनीति को कभी उत्थान तो कभी पतन की ओर उन्मुख हुआ। लेकिन वर्त्तमान यानि कि आज़ादी के बाद से अभी तक की राजनीति का चेहरा , सम्पूर्ण राजनीति के चेहरे से काफी भिन्न प्रतित हो रहा है , आज कि राजनीति को हम क़िस प्रकार आंकलन करें ये समझ से परे प्रतित हो रही है क्योकि आज के कुछ राजनेताओ कि नैतिकता पूर्णतया पतनोन्मुख कि और अग्रसर हो चुकि है। आज कुछ राजनेता अपनी पद , पदवी ,और अपनी कुर्सी के लिए किसी भी हद तक जा सकने में सामर्थ्य वान होते हैं।आज की राजनीति और कुछ राजनेता इतना भ्रस्ट हो चुकें है कि राजनीति को व्यापार बना लिया है,और अपनी राजनीति रूपी व्यापार को चलाने के लिए किसी भी हद तक जा सकतें है , आज कि राजनीति स्वक्छ और नैतिकवान राजनेताओं के लिए तरस रही है. लेकिन हमारी राजनीति जो इस कगार पे पहुँची है क्या इसमें सिर्फ इन राजनेताओ को दोष देना उचित होगा। अगर इसका जवाव मेरे तरफ से दि जाए तो मेरा जवाव "नहीं" होगा क्योकि ये जो राजनेता है वो कहीं से अवतरित नहीं हुए है,ये हमारे समाज से हमारे द्वारा ही चुनकर हमारा प्रतिनिधित्व करतें है,उनका जन्म भी हमारे समाज मैं होता है और पलते बढ़ते भी इसी समाज मैं है, जब इतना कुछ हमारे समाज से ही होता है तो हम संपूर्ण दोष सिर्फ इन राजनेताओ को ही क्योँ देतें है , क्या इसमें हमारी गलती नहीं है , जहाँ तक मेरा सोचना है मैं इसमें समाज को भी बहुत हद तक जिम्मेदार मानता हु, क्योकि जब उनका जन्म , भरण पोषण सब कुछ हमारे साथ ही होता है तो हमें उनकी चारित्रिक,नैतिक,और बौद्धिक छमताओं के बारे में अवश्य जानकारी होती होगी,क्योकिजिस प्रकार चन्दन के आस पास कि भूमि चंदन के संपर्क में आने से सुगंधित हो जाती है उसी प्रकार हमें अपने समाज के हर मनुस्य को भली भांति जानतें हैं, फिर हम इतना सब कुछ जानने के बावजूद उन्ही को क्योँ चुन कर हम अपना प्रतिनिधि बनाते है , इसलिए नैतिकता के तौर पर हमें भी अपने आपको दोषी मानकर चलना पड़ेगा । इसलिए अगर हमें इस राजनीति को स्वक्छ बनाना है तो सबसे पहले हमें सुधरना पड़ेगा , तभी हमारी राजनीति सुधरेगी, क्योकि हम हैं तो राजनीति हैं , इसलिए हमें ये प्रण करना पड़ेगा कि हम जिस प्रतिनिधि को चुनकर अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज रहे है उनकी छवि कैसी हैं , वो किस हद तक ज्ञानी है , सामाज के लिए उनका दृष्टिकोण कैसा है , अगर हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तो हमारी राजनीति शनै शनै पुनः उसी प्रकार कि स्वक्छ राजनीति में परिवर्तित होना प्रारम्भ हो जायेगी और हमारा भारत फिर से विश्वगुरु बन जायेगा।
(बन्दे मातरम )
(कृष्णा कान्त मिश्र )
(बन्दे मातरम )
(कृष्णा कान्त मिश्र )

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